हम को अब तक दे रही है,ज़िन्दगी तनहाइयाँ
हर नफ़स,हर तार में बस,सिर्फ़ हैं तनहाइयाँ
साथ छोड़ दिया है तेरे, ग़म ने भी अब तो
हैं फ़क़त चार सू अब,अपने तो तनहाइयाँ
मुझको मुल्के-ख़्वाब से, ना बुलाओ दोस्तो,
आँखें खोलते वे ही फिर,घेर लेंगी तनहाइयाँ
रात का सन्नाटा हाँ कुछ, गा कर सुनाता है
दूर तक फ़जां में अब तो,हैं बसी तनहाइयाँ
(रचना-तिथि:---28-07-1992)
" कुछ लम्हे जब दिल की दीवारें कुरेच कर अन्दर उतर आते हैं,तो आँखों के ग़र्म पानी और दिल के जज़्बों को लफ़्ज़ों के साथ कर देता हूँ |... लोग कहते हैं कि मैंने ग़ज़लें-नज़्में कही हैं | "
नफ़स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नफ़स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
ग़ज़ल:--- " हमराह मिरा कहाँ रहा ? "
हर शजर तिरी याद का,धू-धू कर के जल रहा,
बेबसों की जमात में, मेरा दिल अव्वल रहा
हर नफ़स में है घुटन,औ' हर तसव्वुर ख़ाक है,
शहरे-दिल में अब के तो,मौत-सा मातम रहा
चल रहे थे हम मुसलसल,वक़्त की रफ़्तार से,
क्या पता इस राह में,हमराह मिरा कहाँ रहा ?
वहीँ पे अपने दिल की, ख़्वाहिशें बेकार हैं,
जिस जगह पे तेरे दिल का,ना कोई रस्ता रहा
अपनी हालत खुद बयां,करना हमें आता नहीं,
जिसे जो कुछ देखना हो,देख ले मैं कां रहा ?
एक उस के नाम से ही,'कुमार' वाबस्ता न रह,
क्या करेगा तब अगर जब,वो भी बेवफ़ा रहा
(रचना-तिथि:---18-04-1993 )
बेबसों की जमात में, मेरा दिल अव्वल रहा
हर नफ़स में है घुटन,औ' हर तसव्वुर ख़ाक है,
शहरे-दिल में अब के तो,मौत-सा मातम रहा
चल रहे थे हम मुसलसल,वक़्त की रफ़्तार से,
क्या पता इस राह में,हमराह मिरा कहाँ रहा ?
वहीँ पे अपने दिल की, ख़्वाहिशें बेकार हैं,
जिस जगह पे तेरे दिल का,ना कोई रस्ता रहा
अपनी हालत खुद बयां,करना हमें आता नहीं,
जिसे जो कुछ देखना हो,देख ले मैं कां रहा ?
एक उस के नाम से ही,'कुमार' वाबस्ता न रह,
क्या करेगा तब अगर जब,वो भी बेवफ़ा रहा
(रचना-तिथि:---18-04-1993 )
सदस्यता लें
संदेश (Atom)