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रविवार, 26 सितंबर 2010

ग़ज़ल---" कर के क्यूँ बंद किवाड़े रहता है ? "

          औरों के घर-आँगन में, जो आँखें फाड़े
          वो ही शख्स भला,करके-क्यूँ बंद किवाड़े रहता है ?
                          (रचना-तिथि:---28-08-1998)      
          गुरबत की क़ुर्बत के ही हैं, यार तमाशे ये सारे
          वरना सोचो-कौन शौक़ से,बदन उघाड़े रहता है ?
                           (रचना-तिथि:---28-08-1998)  
          उसका हँसना,उस का रोना,मुझ से जुदा हुए हैं यूँ
         वो जो मेरे घर-आँगन के,इस पसवाड़े* रहता है
                                (*पसवाड़े-पहलू )
                             (रचना-तिथि:---28-08-1998)
          ढूँढा तुमने कहाँ था उसको,और भला वो मिलता कैसे ?
          प्यार तो भैया तेरी नफ़रत,के पिछवाड़े रहता है
                               (रचना-तिथि:---11-09-1998)
          सरगोशी करती हैं यादें,हूक यहाँ भी उठती है
          तेरे वहाँ ये मौसम तो,बस जाड़े-जाड़े रहता है
                                (रचना-तिथि:---11-09-1998)

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ग़ज़ल---" एक मुकम्मल दर्द हैं यादें "


आँसू आँख का गहना है
इस को आँख में रहना है

जीस्त दर्द का अफ़साना है
इस को सब को कहना है

एक मुकम्मल दर्द हैं यादें
जिस को सब को सहना है

रेत का एक क़िला है आशा
इस को इक दिन ढहना है

ये है शहर दर्द का जिसमें
तुझ को 'कुमार' रहना है

(रचना-तिथि:---30-08-1994)

शनिवार, 18 सितंबर 2010

नज़्म---" लम्हात की परछाइयाँ "

हज़ारों सिलसिलों के आगे
हज़ारों-हज़ार मंज़िलों के पार
चलेगा
वक़्त का कारवां |
फ़ना हो जाएँगी सारी तस्वीरें
धुन्दले हो जाएँगे तमाम नक्श |
मगर---
होंगे हम रू-ब-रू
खल्वतों के जब 
याद रहेंगे ये लम्हे
के जब---
ज़िंदगियाँ लहलहायी हैं;
के जब---
लम्हात खिले हैं |
हाँ,ये पुरकशिश मौहब्ब्तें
खींच लाएँगी हमें
तब---फिर इन्हीं लम्हात में |
सरगोशियाँ करेंगी यादें
इन्हीं लम्हात की
परछाइयों में |

(रचना-तिथि:---21-08-1999)