नवीन रचनाएँ:---


रविवार, 3 अक्टूबर 2010

नज़्म---" तुम यानी तुम से परे "


            तुम-
            जिसकी मुस्कुराहट से,
            खिली जाती हैं मेरी साँस ;
            जिस के तसव्वुर से ,
            सँवर-सँवर जाती है,
            ज़िन्दगी मेरी |

            तुम-
            धुंद की गहरी गुफा में,
            लिपटी-सहेजी,
            छुई-मुई-सी पाकीज़गी;
            दौड़ती-भागती नद्दी के,
            शोख़ पानी में तैरता,
            फूल |

            तुम-
            जिसके होने के अहसास से,
            होता है मुझे,
            ख़ुद के होने का अहसास;
            तराई में,
            चढ़ती शाम के साये में,
            बढ़ती,
            मासूम-कमसिन उदासी |

            ओ परी-रू !
            मैंने,
            हँसते फूलों पर लिक्खी हैं,
            सरगोशियाँ तेरे जिस्म की;
            आबशारों की उछालों पर,
            लिक्खे हैं बोल तेरी ख़ामुशी के |

            तुम-
            सुनो---हाँ---तुम;
            बहुत मासूम है,
            तिरी दोशीज़ ख़ूबसूरती;
            बहुत कमसिन है,
            तिरे लब की लर्ज़िश |

            मिरे तसव्वुर के जंगल में,
            तिरी आमद से,
                   आती है,
                     ख़यालों की बहार |
            तिरे होंठों से,
            नुमाया होते हैं,
                  चाँद रमूज़,
                        वक़्त-ए-रूबरू |
            कितनी मरमरी है,
            तिरे लफ़्ज़ों की छुअन,
            तिरे होंठ,
            करके कोई शरारत,
                    तान लेते हैं खामुशी,
            और,
               ये दिल मुज़्तरिब हो कर,
               कहीं कुछ ढूँढ़ता रहता है |

            तुम-
               तुम से परे-
               बहुत कुछ हो-
                        सब कुछ हो-
                        मिरी ख़ातिर |

           (रचना-तिथि:---06-05-1998)

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

" फराज़िन्द-ए-हिन्दोस्तान "

( अज़ीम शख्सियत मरहूम लालबहादुर शास्त्री जी को श्रद्धांजलि )



हिन्दोस्तां को आप-सा,कोई रहनुमा मिले 
हादिसों की ज़द में,अब कोई रास्ता मिले

इलाहबाद की गलियों से उठा,हिन्दोस्तां पे छा गया 

यूँ लगा इक और सूरज,आसमां पर आ गया

गंगा के पानी-सी सादा,ज़िन्दगी उस की थी यारो
हुक्मरां कैसे जिया करते हैं,ये बतला गया

क़द का था छोटा वो लेकिन,हौंसलों का बादशाह
ख़ुद मुख्तारी के तरीक़े मुल्क को सिखला गया

वफ़ा-शियार-ए-मुल्क था,वो आखिरी दम तक रहा
वतन-परस्ती की शमा,हर दिल में रौशन कर गया

दुश्मनों के हमलों को ललकारा लालबहादुर ने
हिन्दोस्तान पूरा का पूरा,उस के संग बढ़ आया था

पाक के नापाक इरादे मटियामेट उस ने किये
दुश्मनों को दिन में तारे,जांबाज़ वो दिखला गया

सर मगर ऊँचा रहा हिन्दोस्तान का उस के दम
हिन्दोस्तान का वीर वो हंगाम को झुठला गया

जहां-भर की ताक़तों से,दर नहीं सकता ये मुल्क
जोश-ए-तमनाओं का नेजा,इस तरह फहरा गया

मुल्क था आँखें बिछाए,था उसी का इंतज़ार
पर वो शांति-दूत अपने,अगले सफ़र पे चला गया

हर दिल में उट्ठी हूक औ,हर दिल का दामन चक था
लाल बहादुर मुल्क को,अश्कों से नहला गया


आ भी जो मुल्क को,तिरी ज़रुरत पेश है
नासबूर हैं हवाएँ जाने,वक़्त क्या दिखला गया

काश ! वो मिसाले-लाल बहादुर फिर मिले
'कुमार' गूंगी फ़रावां को,कहना जो सिखला गया

             (रचना-तिथि:---29-09-1994)

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

" मुद्राराक्षस "

मरणासन्न भावनाएँ,
मिटते सम्बन्ध-चिह्न,
लुप्त होती नैतिकता,
      सब का हेतु एक-
              फैलता अर्थ-आयाम |
जाने,
     कब,
     किस दिशा में,
     मिलेगा लक्ष्य?
संभवतः,
     समाज सचमुच,
     बन गया है-
              मुद्राराक्षस |

(रचानाता-तिथि:---07-06-92)

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

" मंदिर वहीँ बनाएँगे "

(राममंदिर के लिए अयोध्या में ०६ दिसंबर,१९९२ को शहीद हुए  प्रातःस्मरणीय व्यक्तित्वों को प्रणाम-स्वरुप)

जहाँ शहीद हुए 'कोठारी बन्धु'*,वहाँ जां की बाज़ी लगाएँगे
जहाँ  राम ने जन्म लिया है,मंदिर वहीँ बनाएँगे ...
अब तो इन तूफानों को हम,दिल्ली तक ले जाएँगे
जहाँ  राम ने जन्म लिया है,मंदिर वहीँ बनाएँगे ...

हमें किसी से बैर नहीं पर,गद्दारों  की ख़ैर नहीं
अपने लिए कोई ग़ैर नहीं पर,गद्दारों की ख़ैर नहीं
 चुप रहने के दिन बीते,चुप रहने का अब समय नहीं
इन गद्दारों से कह दो,अब ये कुछ भी करें नहीं
अब अंगारे ही उछलेंगे,अब तो ज्वाला ही भड़केगी
जो है सच्चा रामभक्त,उस की तो भुजाएँ फड़केंगी
हम जन्मभूमि के दीवाने हैं,इस के लिए लुट जाएँगे
        ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

फिर से रामलला होंगे वां ,हम ने ये इक़रार किया
तुम न समझोगे गद्दारो ! तुम ने कब राम से प्यार किया
किया खून का तिलक उन्होंने,जन्मभूमि के भाल पर
है जन्मभूमि भी गर्वित अपने, उस रणबाँकुरे लाल पर
तुम हनुमान हो हिन्दुओ ! ये लंका आज जला डालो
भारत की रामायण से,रावण का नाम मिटा डालो
 अब ये शिवाजी-राणा प्रताप,आंधी बन के छाएँगे
            ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

वो लोग हमें क्या समझेंगे,जिन्हें भारत से प्यार नहीं
हमें चाहिए गर्वित हिन्दू,कुत्तों की दरकार नहीं
अब देखेगा ये संसार कि,हिन्दू भला क्या होता है
इस को देखे जो आँखें उठा कर,वो आँखों को खोता है
हम तो प्यारे लाल क़िले पर,केसरिया लहराएँगे
          ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

जो इस धरती का खाते हैं,औरों के गुण गाते हैं
जो इस के टुकड़े करने को,औरों से धन भी पते हैं
वे कान खोल के सुन लें,उन के परखच्चे उड़ा देंगे
सर्वनाश कर देंगे उन का,हम उन क नाम मिटा देंगे
भारत को जो शूल भी चुभी,हम उन को शूली चढ़ा देंगे
अपने हाथों को काट के हम ने,उन को आश्रयदान दिया
 वे हम को आँख दिखाते हैं,हम को ये प्रतिदान दिया
बात-बात पर पकिस्तान का नारा लगाने वालो ! सुनो
या तो राम का धाम चुनो,या बाबर की ज़ात चुनो
बांग्लादेश औ'पाक को फिर से,भारत का अंग बनाएँगे
         ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

*'कोठारी बन्धु':---बीकानेर (राजस्थान) के दो भाइयों-राम और शरद कोठारी  ने ०६ दिसंबर,१९९३ रामजन्मभूमि के माथे का कलंक मिटने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी  

                                        (रचना-तिथि:---06-11-1993)



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ग़ज़ल---" आशिक़ों को जगह दीजिए "

                        सारे परदे उठा दीजिए
                        हुस्न का मज़ा लीजिए

                       आप का नूर आया है जो
                       ये चराग़ बुझा दीजिए

                       दिल हमारे बहल जाएँगे
                       आप ज़रा मुस्करा दीजिए

                      और लोग हो जाएँ पीछे
                      आशिक़ों को जगह दीजिए

                      आप का हाले-दिल जान लेंगे
                      अपने दिल में जगह दीजिए

                      ये नज़ारे मचल जाएँगे
                      इक नज़र तो चला दीजिए

                      हम ने कर ली मुहब्बत 'कुमार'
                      अब चाहे जो सज़ा दीजिए

                                      (रचना-तिथि:---23-03-1992)

बुधवार, 29 सितंबर 2010

" मंदिर वहीँ बनाएँगे "

(राममंदिर के लिए अयोध्या में ०६ दिसंबर,१९९२ को शहीद हुए  प्रातःस्मरणीय व्यक्तित्वों को प्रणाम-स्वरुप)

जहाँ शहीद हुए 'कोठारी बन्धु'*,वहाँ जां की बाज़ी लगाएँगे
जहाँ  राम ने जन्म लिया है,मंदिर वहीँ बनाएँगे ...
अब तो इन तूफानों को हम,दिल्ली तक ले जाएँगे
जहाँ  राम ने जन्म लिया है,मंदिर वहीँ बनाएँगे ...

हमें किसी से बैर नहीं पर,गद्दारों  की ख़ैर नहीं
अपने लिए कोई ग़ैर नहीं पर,गद्दारों की ख़ैर नहीं
 चुप रहने के दिन बीते,चुप रहने का अब समय नहीं
इन गद्दारों से कह दो,अब ये कुछ भी करें नहीं
अब अंगारे ही उछलेंगे,अब तो ज्वाला ही भड़केगी
जो है सच्चा रामभक्त,उस की तो भुजाएँ फड़केंगी
हम जन्मभूमि के दीवाने हैं,इस के लिए लुट जाएँगे
        ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

फिर से रामलला होंगे वां ,हम ने ये इक़रार किया
तुम न समझोगे गद्दारो ! तुम ने कब राम से प्यार किया
किया खून का तिलक उन्होंने,जन्मभूमि के भाल पर
है जन्मभूमि भी गर्वित अपने, उस रणबाँकुरे लाल पर
तुम हनुमान हो हिन्दुओ ! ये लंका आज जला डालो
भारत की रामायण से,रावण का नाम मिटा डालो
 अब ये शिवाजी-राणा प्रताप,आंधी बन के छाएँगे
            ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

वो लोग हमें क्या समझेंगे,जिन्हें भारत से प्यार नहीं
हमें चाहिए गर्वित हिन्दू,कुत्तों की दरकार नहीं
अब देखेगा ये संसार कि,हिन्दू भला क्या होता है
इस को देखे जो आँखें उठा कर,वो आँखों को खोता है
हम तो प्यारे लाल क़िले पर,केसरिया लहराएँगे
          ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

जो इस धरती का खाते हैं,औरों के गुण गाते हैं
जो इस के टुकड़े करने को,औरों से धन भी पते हैं
वे कान खोल के सुन लें,उन के परखच्चे उड़ा देंगे
सर्वनाश कर देंगे उन का,हम उन क नाम मिटा देंगे
भारत को जो शूल भी चुभी,हम उन को शूली चढ़ा देंगे
अपने हाथों को काट के हम ने,उन को आश्रयदान दिया
 वे हम को आँख दिखाते हैं,हम को ये प्रतिदान दिया
बात-बात पर पकिस्तान का नारा लगाने वालो ! सुनो
या तो राम का धाम चुनो,या बाबर की ज़ात चुनो
बांग्लादेश औ'पाक को फिर से,भारत का अंग बनाएँगे
         ... जहाँ राम ने जन्म लिया,हम मंदिर वहीँ बनाएँगे

*'कोठारी बन्धु':---बीकानेर (राजस्थान) के दो भाइयों-राम और शरद कोठारी  ने ०६ दिसंबर,१९९३ रामजन्मभूमि के माथे का कलंक मिटाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी  

                                        (रचना-तिथि:---06-11-1993)

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ग़ज़ल---" मन का रिक्त शिवाला है "

                         मैंने    दर्द   को   पाला है
                         हर  घाव मिरा निवाला है

                         जब से किसी की मूरत रूठी
                         मन  का  रिक्त  शिवाला है

                         तेरा  नाम  लिखा  जिस पे
                         वो  पन्ना आज निकाला है

                         समय  का  पतझर ले डूबा
                         अब बाग़ कहाँ हरियाला है

                         कभी बना था रेत का दरिया
                        'कुमार'  आज  हिमशाला है

                                     (रचना-तिथि:---28-11-1997)

सोमवार, 27 सितंबर 2010

नज़्म:---" अनदेखे,अनजाने देश "

                हँसते होंठों के बीच,
                और,
                मुस्कुराती पलकों में,
                             अनदेखे,अनजाने,
                             कई देश बसते हैं
                मगर,
                       इन देशों तक पहुँचने के लिए,
                       पहले,
                       गुज़रना पड़ता है,
रोते हुए कलेजों की,
                       पगडंडियों से |

(रचना-तिथि:---28-06-1995)

रविवार, 26 सितंबर 2010

ग़ज़ल---" कर के क्यूँ बंद किवाड़े रहता है ? "

          औरों के घर-आँगन में, जो आँखें फाड़े
          वो ही शख्स भला,करके-क्यूँ बंद किवाड़े रहता है ?
                          (रचना-तिथि:---28-08-1998)      
          गुरबत की क़ुर्बत के ही हैं, यार तमाशे ये सारे
          वरना सोचो-कौन शौक़ से,बदन उघाड़े रहता है ?
                           (रचना-तिथि:---28-08-1998)  
          उसका हँसना,उस का रोना,मुझ से जुदा हुए हैं यूँ
         वो जो मेरे घर-आँगन के,इस पसवाड़े* रहता है
                                (*पसवाड़े-पहलू )
                             (रचना-तिथि:---28-08-1998)
          ढूँढा तुमने कहाँ था उसको,और भला वो मिलता कैसे ?
          प्यार तो भैया तेरी नफ़रत,के पिछवाड़े रहता है
                               (रचना-तिथि:---11-09-1998)
          सरगोशी करती हैं यादें,हूक यहाँ भी उठती है
          तेरे वहाँ ये मौसम तो,बस जाड़े-जाड़े रहता है
                                (रचना-तिथि:---11-09-1998)