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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ग़ज़ल---"हमनशीं हमनाम है"


                                 तू माहताबे-हुस्न है,दो जहां में तेरा नाम है 
                        तू चाहे तो शायर नामवर,न चाहे तो वो बदनाम है 

                              
                        ज़रा उठा के इक नज़र,देख लो शायर को तुम 
                        उस के लिए तो बस यही,सब से बड़ा ईनाम है 


                        अब की जब वो मिले,कह दी अपने दिल की बात 
                        मेरी शायरी कुछ और नहीं,आप को पैग़ाम है 


                         बे-मय-ओ-मीना ही बहक,जाता है आ के 'कुमार'
                         कैसा अजब ओ जाने-जां,तिरे मयकदे का निजाम है 


                         जिस का हमें है इंतज़ार,क्या बताएँ हम 'कुमार'
                         है फ़क़त सूरत जुदा,वो हमनशीं हमनाम है 
                        
                                                 (रचना-तिथि:---12-09-1991) 



4 टिप्‍पणियां:

  1. घणी खम्मा
    खोजने में मैं खुदा निकला था . मिल गयी महोबत ! कुमार साब ! चलो âप हमे नेट पे तो मिल गए .
    बधाई !
    साधुवाद
    सादर !

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  2. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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