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सोमवार, 5 दिसंबर 2011

'ऐ ज़िंदगी'

चाँद-सूरज की खूंटियों पे,
गीला दिल सूखने को टाँगा था|
अपने लबों की लर्जिश थामने को,
लिया था तेरा दोशीजा चेहरा हाथों में|
ऐ ज़िन्दगी!
क़दम-ताल तो कर ही रहा हूँ
तेरे साथ,
मगर-
इतना तो बता दे,
के,
तेरी धुन इतनी मोहक क्यूँ है?  


1 टिप्पणी:

  1. चाँद-सूरज की खूंटियों पे,
    गीला दिल सूखने को टाँगा था|

    बहुत सुन्दर बिम्ब ..अच्छी प्रस्तुति

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