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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कुछ भी तो नहीं बदला

रात---
           आज भी महकती है ,
दिन---
            आज भी चहकता है,
पल---
            आज भी खनकते हैं,
हवा---
           आज भी सनसनाती है |
ना तो सूरज रूठा है,
      और,
          ना ही नाराज़ हुआ है चाँद |
कुछ भी तो नहीं बदला
इन बीते बरसों में;
                 सब कुछ है,
                            वैसा का वैसा |
बस---
          वक़्त के साथ,
          धुंदली हो गयीं,
                               चंद तस्वीरें |
 

6 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  2. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

    किसी भी तरह की तकनीकिक जानकारी के लिये अंतरजाल ब्‍लाग के स्‍वामी अंकुर जी,
    हिन्‍दी टेक ब्‍लाग के मालिक नवीन जी और ई गुरू राजीव जी से संपर्क करें ।

    ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत की कक्ष्‍या चल रही है ।

    आप भी सादर आमंत्रित हैं,
    http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ पर आकर हमारा मार्गदर्शन करें व अपने
    सुझाव दें, और अगर हमारा प्रयास पसंद आये तो हमारे फालोअर बनकर संस्‍कृत के
    प्रसार में अपना योगदान दें ।
    यदि आप संस्‍कृत में लिख सकते हैं तो आपको इस ब्‍लाग पर लेखन के लिये आमन्त्रित किया जा रहा है ।

    हमें ईमेल से संपर्क करें pandey.aaanand@gmail.com पर अपना नाम व पूरा परिचय)

    धन्‍यवाद

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  4. डॉ.कुमार गणेश जी
    नमस्कार !आज चिट्ठाजगत की मेहरबानी से आपका स्वागत करने का सुअवसर मिल रहा है ।
    … वैसे आप शायद अंतर्जाल पर मुझसे बहुत पहले से सक्रिय हैं ।

    बहुत अच्छी नज़्म के लिए बधाई और आभार स्वीकार करें ।

    कुछ भी तो नहीं बदला
    इन बीते बरसों में;
    सब कुछ है,
    वैसा का वैसा


    जान कर तसल्ली हुई ।

    बस---
    वक़्त के साथ,
    धुंदली हो गयीं,
    चंद तस्वीरें |


    वाह ! वाऽऽह !
    लेकिन वक़्त पर किसका जोर चला है ?!
    बहुत मार्मिक और भावपूर्ण रचना के लिए पुनः बधाई !

    शुभकामनाओं सहित …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. नमस्कार ! आपकी यह पोस्ट जनोक्ति.कॉम के स्तम्भ "ब्लॉग हलचल " में शामिल की गयी है | अपनी पोस्ट इस लिंक पर देखें http://www.janokti.com/category/ब्लॉग-हलचल/

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