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बुधवार, 15 सितंबर 2010

ग़ज़ल:--- " चैन से अब तक ना सोया "

जब से तेरे शहर से बिछड़ा,चैन से अब तक ना सोया
आसमान से टूटा तारा,तू क्या जाने कितना रोया

बरसों भटका दूर किनारे,सदियाँ गुज़रीं रात अंधेरे
बरसों थामी तेरी हसरत,तेरा दामन हो गोया

तुझ से अलग ना कुछ हूँ,तेरा साथ ही सब कुछ था
तुम बिन क्या ये जीना-मरना,क्या जागा,मैं क्या सोया

मेरा तसव्वुर मुँह ताके है,किस के ख्वाब भरूँ इस में
तेरे बिना हैं फ़क़त खलाएँ,तुम बिन यां पे कुछ ना होया


( रचना-तिथि:---22-08-1999 )

4 टिप्‍पणियां:

  1. जब से तेरे शहर से बिछड़ा,चैन से अब तक ना सोया
    आसमान से टूटा तारा,तू क्या जाने कितना रोया
    बहुत अच्छी लगी आपकी ये ग़ज़ल

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  2. बहुत अच्छी लगी आपकी ये ग़ज़ल|

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  3. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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